Sunday, October 13, 2019

आई, दिवाली आई !!!

आई दिवाली फिर से आई
शुरू हो गई साफ सफाई
आई दिवाली आई !

साफ सफाई सीमित घर तक,
रस्तों पर कचरे का जमघट,
बाजारों की फीकी रौनक,
मिली नहीं है अब तक बोनस,
कैसे बने मिठाई !
आई दिवाली आई !

हुआ दिवाली महँगा सौदा,
पनप रहा ईर्ष्या का पौधा,
पहले सा ना वह अपनापन,
हुआ दिखावे का अब प्रचलन,
खत्म हुई पहुनाई !

कभी धमाके से आती थी,
खूब पटाखों में छाती थी,
मीठा मन था मीठी बोली,
अब कैसी दीवाली, होली !!!

बेबस चेहरों की मायूसी,
मजदूरों की देख उदासी,
सारी खुशियाँ आँख चुरातीं,
त्योहारों की खानापूर्ती,
करती है महँगाई !
आई दिवाली आई !




4 comments:

  1. वर्तमान परिस्थितियों में आपकी रचना सटीक बैठती है।

    अब इस बनावटी दुनिया को देख , इच्छाएँ अवश्य मर गयी हैं दी।
    पता नहीं किधर से आस्तीन के सांप निकल आए।

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  2. समसामयिक विसंगतियों पर चिन्तन करती सुन्दर रचना ।

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  3. मीना दी, वर्तमान स्थिति को देखते हुए सटीक प्रस्तूति। लेकिन हम भारतीय हैं और इन विपरीत परिस्थितियों में भी दिवाली धूमधाम से ही मनाने का जज्बा रखते हैं। चाहे तो कर्जा लेकर मनाएंगे लेकिन मनाएंगे जरूर।

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  4. महंगाई की मार सब पर भारी
    यहां तक कि हमारे त्योहार भी अछूते ना रहे।
    सुंदर।
    मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है 👉👉  लोग बोले है बुरा लगता है

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