Tuesday, April 30, 2019

मेरे दोस्त !

ज़िंदा हूँ साँसें अब भी चल रही हैं मेरे दोस्त !
थकी-थकी सी शाम, ढल रही है मेरे दोस्त !

बुलबुल ने साथ छोड़ दिया सूखे गुलों का
कि रुत बहार की निकल रही है मेरे दोस्त !

महफिल में कौन देख सका शमा के आँसू
परवाने से पहले वो जल रही है मेरे दोस्त !

अहसास होगा अपनी ख़ता का कभी तुम्हें
रूह इस खयाल से, बहल रही है मेरे दोस्त !

बहला रहे हैं दिल को गलतफहमियों से हम
कैसी बुरी आदत ये पल रही है मेरे दोस्त !

दिन में पचास रंग बदलता रहा सूरज
धरती भी रंग अब, बदल रही है मेरे दोस्त !

दिल के उसी कोने को जरा छू के देखना
धड़कन वहाँ मेरी मचल रही है मेरे दोस्त !





Wednesday, April 24, 2019

वेदना से प्रेम तक

एक पल का,
हाँ, सिर्फ एक पल का
समय लगता है,
भावना का रुपांतरण
वेदना में होने के लिए !
और वही पल साक्षी होता है
मनुष्य में ईश्वर के अंश का।

वेदना के अभाव में
ईश्वर के दूत भटकते हैं धरती पर,
खोजते हैं अश्रुओं के मोती
जो नयनों की सीपियों में पलते
और सिर्फ इसी लोक में मिलते हैं।

ब बदल जाती है
वेदना संवेदना में
तब स्वर्ग से होती है पुष्पवर्षा
झाँकते हैं देवगण
मनुष्यों के हृदय से !

संवेदना के तुषार बिंदुओं में
भीगने आती हैं अप्सराएँ !
ठीक उस क्षण, जिस क्षण
संवेदना हो जाती  है प्रेम
उसी क्षण हो जाती है
यह धरती स्वर्गसम !!!

Thursday, April 18, 2019

गीत उगाए हैं !!!

मन की बंजर भूमि पर,
कुछ बाग लगाए हैं !
मैंने दर्द को बोकर,
अपने गीत उगाए हैं !!!

रिश्ते-नातों का विष पीकर,
नीलकंठ से शब्द हुए !
स्वार्थ-लोभ इतना चीखे कि
स्नेह-प्रेम निःशब्द हुए !
आँधी से लड़कर प्राणों के,
दीप जलाए हैं !!!
मैंने दर्द को बोकर अपने....

अपनेपन की कीमत देनी,
होती है अब अपनों को !
नैनों में आने को, रिश्वत
देती हूँ मैं सपनों को !
साँसों पर अभिलाषाओं के
दाँव लगाए हैं !!!
मैंने दर्द को बोकर अपने....

नेह गठरिया बाँधे निकला,
कौन गाँव बंजारा मन !
जाना कहाँ, कहाँ जा पहुँचा,
ठहर गया किसके आँगन !
पागल प्रीत लगा ना बैठे,
लोग पराए हैं !!!
मैंने दर्द को बोकर, 
अपने गीत उगाए हैं !!!

Sunday, April 14, 2019

और मुकम्मल तन्हाई !

आधा चाँद है, आधी रात
और मुकम्मल तन्हाई !
राज़ अधूरे, बात अधूरी
और मुकम्मल तन्हाई !

जागी जागी आँखों पर
अश्कों का हक भी पूरा नहीं,
नींद अधूरी, ख्वाब अधूरे
और मुकम्मल तन्हाई !

खुशबू से लिखे थे खत मैंने,
तुमको लफ्जों की आदत थी !
तुम पढ़ ना सके पैगाम अधूरे
और मुकम्मल तन्हाई !

कुछ हम पर था ऐतबार अधूरा
कुछ मगरूरी, कुछ दूरी !
चाह अधूरी, प्यार अधूरा
और मुकम्मल तन्हाई !

लहरों ने मिटा डाले होंगे
सागर के किनारे से सारे निशां,
वो रेत के घर, वो नाम अधूरे
और मुकम्मल तन्हाई !

मंजिल को पाने की चाहत
और राहों की पहचान नहीं,
है सफर अधूरा, साथ अधूरे
और मुकम्मल तन्हाई !

Saturday, April 13, 2019

मानव, तुम्हारा धर्म क्या है ?

धर्म चिड़िया का,
खुशी के गीत गाना  !
धर्म नदिया का,
तृषा सबकी बुझाना ।
धर्म दीपक का,
हवाओं से ना डरना !
धर्म चंदा का,
सभी का ताप हरना ।।

किंतु हे मानव !
तुम्हारा धर्म क्या है ?

धर्म तारों का,
तिमिर में जगमगाना !
धर्म बाती का,
स्वयं जल,तम मिटाना ।
धर्म वृक्षों का,
जुड़े रहना मृदा से !
धर्म फूलों का,
सुरभि अपनी लुटाना ।।

किंतु हे मानव !
तुम्हारा धर्म क्या है ?

धर्म चींटी का,
बताना मर्म श्रम का !
धर्म सूरज का,
अधिक ना तप्त होना ।
धर्म सागर का,
रहे सीमा में अपनी !
धर्म मेघों का,
बरसकर रिक्त होना ।।

किंतु हे मानव !
तुम्हारा धर्म क्या है ?

धर्म पर्वत का,
अचल रहना हमेशा !
धर्म ऋतुओं का,
धरा को रंग देना ।
धर्म धरती का,
उठाना भार सबका !
धर्म नभ का है,
विहग को पंख देना ।।

किंतु हे मानव !
तुम्हारा धर्म क्या है ?
 --- मीना शर्मा ---

Tuesday, April 9, 2019

एक कहानी अनजानी !

आँखों में बसा लो स्वप्न मेरा
होठों में दबा लो गीत मेरे !
बंजारे मन का ठौर कहाँ,
ढूँढ़ोगे तुम मनमीत मेरे !
बस एक कहानी अनजानी
सीने में छुपाकर जी लेना !!!

फूलों की खुशबू बिखरेगी,
तो बाग भी सारा महकेगा ।
धीमे से आना द्वार मेरे,
आहट से ये मन बहकेगा !
तुम मेरी कहानी अनजानी
सीने में छुपाकर जी लेना !!!

तारों में बीच में मत खोजो,
चंदा के गुमसुम मुखड़े को,
रूठे रहने दो आज मुझे,
मत खत्म करो इस झगड़े को !
फिर एक कहानी अनजानी
सीने में छुपाकर जी लेना !!!

नदिया के किनारे सूने क्यों,
क्यों सागरतट है वीराना ?
तुम जिद ना करो यूँ सुनने की,
जिद्दी लहरों का अफसाना !
अनकही, कहानी अनजानी
सीने में छुपाकर जी लेना !!!

मत क्षुद्र पतंगे - सा जलना,
नदिया-सागर सम मत मिलना !
धरती-नभ जैसे मिलकर हम,
रच लेंगे एक क्षितिज अपना !
हाँ, यही कहानी अनजानी
सीने में छुपाकर जी लेना !!!

एक कहानी अनजानी
सीने में छुपाकर जी लेना !!!







Thursday, April 4, 2019

समय ना मिला....

सारे संसार के काम करता रहा,
तेरे सुमिरन का मुझको समय ना मिला !
सारी दुनिया से नाता निभाता रहा,
तुझसे मिलने का मुझको समय ना मिला !

सुबह आती रही, शाम जाती रही,
ज़िंदगी खेल अपने दिखाती रही,
तेरी भक्ति कहाँ से शुरू मैं करूँ,
इसी उलझन में मुझको समय ना मिला !
तुझसे मिलने का.....

मिट गए रात दिन, बुलबुलों की तरह
देह मुरझाई सूखे गुलों की तरह,
फिर भी जागा नहीं, मोह त्यागा नहीं,
तेरे दर्शन का मुझको समय ना मिला !
तुझसे मिलने का....

खेत चिड़िया ने जब चुग लिया, चुग लिया !
माया ठगिनी ने जब ठग लिया, ठग लिया !
भर गया तब घड़ा, काल सम्मुख खड़ा !
हाय ! बचने का मुझको समय ना मिला !!!
तुझसे मिलने का.....